#वहम:
ले हवा की सींखचे , ये आदमी ही आदमी
दौडते हर बात पर, बस चीखते हर बात पर,
ताकतों का वहम है या , तख्तियौं से डर रहै,
कितनें कायर हौ गये है, आदमी ही आदमी !
इक नदी पर, इक पहाडी, इक कब्र पर हक जता,
बस आंख मुदै हर शहर में, रौ रहै हैं आदमी!
में का ऐसा मौद है तो, दिल जुबां को पाक कर
क्युं खां-मखा ही कतरनों को, बौ रहैं है आदमी!
मयहौश में है, तुं जबीं पर जल रहा है, ख़ाख में
बैहौश हौकर इस जमीं पर, सौ रहे हैं आदमी!
रैत की मौहरे निंगल कर, पास्तों के गीत गा,
जन्नतों के किस वहम में, जी रहैं है आदमी!
जिस जगह पर तुं खडा है, कल यहां कौई और था,
जहर को माकूल कर क्युं, पी रहै हैं आदमी !!
#शक्ति_बारैठ
Writer - poet - Shakti Bareth
ले हवा की सींखचे , ये आदमी ही आदमी
दौडते हर बात पर, बस चीखते हर बात पर,
ताकतों का वहम है या , तख्तियौं से डर रहै,
कितनें कायर हौ गये है, आदमी ही आदमी !
इक नदी पर, इक पहाडी, इक कब्र पर हक जता,
बस आंख मुदै हर शहर में, रौ रहै हैं आदमी!
में का ऐसा मौद है तो, दिल जुबां को पाक कर
क्युं खां-मखा ही कतरनों को, बौ रहैं है आदमी!
मयहौश में है, तुं जबीं पर जल रहा है, ख़ाख में
बैहौश हौकर इस जमीं पर, सौ रहे हैं आदमी!
रैत की मौहरे निंगल कर, पास्तों के गीत गा,
जन्नतों के किस वहम में, जी रहैं है आदमी!
जिस जगह पर तुं खडा है, कल यहां कौई और था,
जहर को माकूल कर क्युं, पी रहै हैं आदमी !!
#शक्ति_बारैठ
Writer - poet - Shakti Bareth
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