‪‎डुबता_कौन‬ है - Poetry on life by shakti bareth

‪#‎डुबता_कौन‬ है !
उतर रहा था गर्द मिट्टी का चटक भूरा रंग
काली पड रही थी , चमक सुनहरी धूप
ढल रहा था सुरज दंभ कै पहाड की और
पहाडी पैड रोकतै रहै गर्दन उठा उठा कर,
पर दैखतै ही वौ गिर पडा गहरी खाई में
ना जानें कहां, कितनी दूर, किस और,
हमसब इधर थे, और वौ उधर डूब गया.
छायां उग आई, जिसे रात कहनें लगै
परछाई कौ नाम दिया की वह चांद है
टुकडै बिखरै तो तारै बतलाये गये.
सब कह रहै है, डुबता कौन है,
जौ डुबा है, कल फिर डुबैगा
सफर ही तौ है,
कल फिर सफर हौगा !
‪#‎बारैठ‬

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