तुम्हारी हदिशों का तलबगार - Shakti Bareth - ग़जल


जो आदमी बाज़ार को दुरुस्त करने निकलता है
वही कभी बिकाऊ तो कभी ख़रीददार हो जाता है

कोई शब-ए-रंग फ़िज़ाओं के तलाश करते करते
बहक जाता है,  जब हुश्न-ए-दीदार हो जाता है

आएगा दिन क़यामत का तब तक ख़ून-ए-जंग सही
क़यामत के दिन भी क़यामत से बेज़ार हो जाता है

तुमनें क्या लूटा मेने क्या पाया, उसने क्या बचाया
हर कोई किसी ना किसी का राज़दार हो जाता है

जानें क्या मिला था बस्ती में बस्ती के हज़ारों लड़ बैठे
ना जाने क्यों ये सिलसिला,  बार बार हो जाता है

सोचता हूँ बस में ही बचा हूँ लिखने को सब कुछ
जुनूँ में कागद खून के रंगों में जार जार हो जाता है

अपने राज तुम अपने दिलों में रखो दिखाओ मत
मेरे जैसा तुम्हारी हदिशों का तलबगार हो जाता है

© शक्ति बारैठ - Shakti Bareth Poetry
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