लक्ष्मण जी ने 4 योजन की दूरी से रावण को 100 बाण मार कर ह्रदय भेद दिया, 101 वें बाण से रथ तौड़ डाला, 102, 103 और104 वें बाण से रावण के तीन सारथियों का वद्ध कर दिया. पर 105 वें बाण को प्रत्यंचा पर चढाते ही रावण के प्रति उनका मोह जाग गया. बोहें तन गई, मन व्यथित होने लगा, भुजाएं कांपने लगी. वे देखने लगे की मुर्छित होते हुए रावण जमीदोज हो रहा है और वहां सकल गुणनिधान समस्त जगत के पाप हर्ता श्री भगवान राम ख़ामोश होकर चुपचाप यह लीला देख रहे हैं.
रावण मोह का प्रतीक है, और राम प्रभंजन ! लक्ष्मण जी भीगे नेत्रों से रावण को अन्य राक्षसों द्वारा दुसरे रथ पर डालकर वापस लंका महलों की और जाते देखने लगे.
आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो
गिरयो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो ||
सारथी दुसर घालि रथ तेहि तुरत लंका ले गयो
रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरी प्रभु चरनन्हि नयो ||
कहते हैं इस प्रकार लक्ष्मण जी के हाथों मरता मरता रावण जैसे ही लंका में मूर्छा से जागा, जागते ही वःह अपमान से भर उठा, ग्लानी उसे आत्महत्या पर मजबूर कर रही थी, और उसका हट उसे जीवित रहकर रामद्रोह करने को उकसा रहा था.
कवितावली में एक श्लोक में तुलसीदास जी वर्णन करते हैं
की रावण को ज्ञात हुआ: वह जब लक्ष्मण के सामने २ पहर नहीं रुक सका तो क्या मजाल जो वह
तीनों भुवन के स्वामी श्री भगवान के सामने आधा पहर भी रुक पाए. लक्ष्मण जी को याद करते करते रावण फिर मुर्छित होने लगा, समस्त वैद रावण के जख्मों पर मलहम लगाते रहे, पर मन के घाव कहीं नहीं भर रहे थे. लक्ष्मण ने रावण को राम जी से पहले ही मार दिया. महापराक्रमी रावण आज अमर सेना के सामने इतना भयभीत पहले किसी संग्राम में नहीं हुआ था. पुनर्जन्म की प्रतिज्ञाएँ याद आने लगी. श्राप की त्रास उसके मन में कोंधने लगी की इस जन्म में नहीं तो फिर कभी नहीं. नारायण को प्राप्त करने का इस से बेहतर अवसर अब नहीं हो सकता जब वे स्वयं चलकर उसके द्वार तक आ पहुंचे हैं.
वो और अधिक बलवान होने के लिए यग्य करने लगा, समस्त सामग्री जुटाई और ध्यान में बेठ गया.
श्लोक:
उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य
राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य ||
जब राम जी को विभिक्ष्ण जी के बाबत मालूम हुआ की अब यग्य के बाद रावण को बिना माया के मार पाना आसान नहीं होगा : और माया से मारना राम ने रावण के लिए नहीं चुना था. यह युद्ध तो मर्यादा और माया का था.
वानरों को आदेश हुआ, सुग्रीव जी ने समस्त प्र्बुध्नों को आदेश दिया. और अंगद समेत समस्त वानर सेना लंका के बुर्जों, द्वारों, महलों के कोनों कोनों चढ़ गई.
अंगद नें यग्य के समक्ष बैठे रावण को लात मारी:
“अरे निर्लज्ज! रणभूमि से भाग आया और यहाँ आकर बगुले का सा घ्यान लगाये बैठा है. यग्य नष्ठ कर दिया गया. और रावण को वानर यहाँ वहां से पकड़कर खींचने लगे. जटायें खोल दी, मुकट फेंक दिया, भुजाएं दांतों से काटने लगे, और उसका सम्पूर्ण वैभव तेहस नहस कर डाला.
तब रावण भयानक क्रोधित होकर उठा:
#क्रमश:
#एक तरफ ऋषि गण बैठे थे, दूसरी तरफ वाल्मीकि जी मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं. चोलंग की थाप पर छंद हुलसित हुए, तुलसीदास जी मगन होकर गाने लगे: ---------- जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

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