Ramayan Prasang 2 - रावण मोह का प्रतीक है और राम प्रभंजन


वानरों द्वारा यग्य विध्वंस किये जाने पर रावण का क्रोध उसी पराकाष्ठा को पार कर चूका था जब श्री हनुमान जी नें लंका को लक्षाग्रह बना दिया था.
हनुमान जी के लंकादाह पर रावण नें हनुमान जी की पूंछ को अपनी मूंछ से जोड़ लिया. या तो पूंछ नहीं या मूंछ नहीं.

जब रावण को पता चला की तुच्छ वानर ने लंकाधीश रावण की के नगर में उत्पात मचाया है, तो उसे वश में करने के लिए रावण ने प्रतिज्ञा ली की इस कपि को ऐसा सबक सिखाऊंगा की वो वनवासी राम दौबारा कभी अपनी जिव्हा पर रावण और रावण की लंका का नाम नहीं लेगा !

पर हनुमान को कहाँ अपना अभिमान, हनुमान को स्वयं का कोई मान नहीं. अभिमान है तो सिर्फ इस बात का की वे तो राम के दूत हैं.

संध्याकाल को मायूस लौटे संवाददाताओं से रावण ने जब पूछा की कहाँ हैं सेना?
संवाददाता – सभी मारे गए
अक्षयकुमार कहाँ हैं
संवाददाता – वे भी मारे गए
क्रोध के मारे संवाददाताओं से रावण ने फिर पूछा, और अमर सेना ?
संवाददाता – वे गए
कहाँ गए ?
संवाददाता – आकाश को गए, वे अब नहीं लौट पाएंगे

कुछ देर के लिए रावण का माथा ठनना गया, क्रोध से आँखे भष्मासुर हो उठी, भुजाओं में 100 हज़ार हाथियों का बल भूचाल उठाने लगा, त्योंरियों में नक्षत्र नाच उठे, चाँद ऐसे डर से भभक उठा, समुन्द्र की लहरें प्रबल वेग से नदियों के उद्गम तक जा पहुंची, कैलाश हिलने लगा और लंका में रुदालियों ने मातम के प्रलाप शुरू किये...

“में लंकाअधिपति रामद्रोही रावण सपथ लेता हूँ की इस वानर की पूंछ ही उखाड़ दूंगा, उसके बाद ही निवाला ग्रहण करूँगा”
देव और दानवों के समक्ष मनस का युद्ध शुरू होने को था, एक तरफ राम दूत हनुमान और दूसरी तरफ स्वयं भोलेनाथ भगवान शिव का परम स्नेही, परम भक्त, वः रावण जो जब चाहे आकाश और राशियों की चाल बदल दे, वः रावण जिसके सिंघासन के नीचे स्वयं शनिदेव दबे हुए हैं, जिस से वानरों से राजा स्वयं सुगीव भी भय खाते थे, जिस के सामने 10 हजार एरावत हाथियों के बल वाला स्वर्ग का राजा इन्द्देव भी एक पल टिक पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे.
युद्ध था एक बलिष्ट हाथ का, पहले रावण हनुमान के बल की परीक्षा लेने को उतारू हुए और दौबारा हनुमान रावण पर एक हाथ मारकर अपने बल की परीक्षा देंगे. जो जीतेगा सिर्फ वही जिन्दा रहेगा, और जो नहीं जीतेगा वह सीधा मोक्ष धाम को प्रस्थान करेगा !

तुलसीदास जी कवितावली में इस युद्ध की सप्रसंग व्यख्या लिखते हैं:

देखि पवनसुत धायऊ बोलत बचन कठोर
आवत कपिहि हन्यो तेंही मुष्टि प्रहार प्रघोर ||
चेतावनी सुनकर पवनपुत्र हनुमान कठोर वचन बोलते हुए दौड़े, दो महान बलिष्ठ हुतात्माओं का सशरीर युद्ध होने जा रहा था. सामना होते ही रावण नें इंद्र के हजार वज्र के सामान हनुमान की छाती पर घूंसे का प्रहार किया, जैसे ओघड बादल फाटे हों, जैसे समुद्र बीचों बीच से दहाडा हो, जैसे पर्वत मध्य में से टूट गए हों जैसे लाखों बीजली एक साथ फट पड़ी हो और फिर एकदम शांति, चीर सन्नाटा. हनुमान योगी की मुद्रा में ऑंखें बंद करते हुए घुटनों के बल बैठ गये.
रावण अट्टहास कर उठा, पर दुख उसकी बीस आँखों में साफ झलक उठा की इतने प्रबल प्रहार से जिस जमीन की बड़ी बड़ी कन्धराओं को रावण तहस नहस कर दे उस प्रहार का बजरंग पर कोई प्रभाव नहीं हुआ. वे सिर्फ मंद मंद मुस्कुरा ही रहे हैं. आखिर यह कैसे सम्भव है. रावण अपनी मती और ब्राह्मणत्व को खो चूका था.
परन्तु अब बारी हनुमान की थी, हनुमान जी खड़े हुए और जैसे ही मोर्चा सम्हाला. रावण की आँखों में मौत साफ़ साफ़ दिखाई देने लगी. देवों में भगदड़ मच गई. रावण की सेना पर जैसे असंख्य कुंड जल गिर पड़ा. की राक्षसों के राजा, स्वयम्भू बलिराज रावण के हाथों यह तुच्छ सा कपि आखिर जीवित कैसे रह गया.
ब्रह्मा जी ने शंकर की तपस्या भंग करनी उचित नहीं समझी तो दौड़ कर श्री हरी के पास जा पहुंचे, श्री हरी मौन में थे तो लक्ष्मी जी से प्रार्थना करी की हे देवी हनुमान जी को रोकिये. सूर्य देव साँझ के वक्त भी प्रखर उजास से भर उठे, चन्द्रमा का रंग सुर्ख पड़ गया.
इन्द्रदेव स्वयं सप्तऋषियों से प्रार्थना करने गए तो देखा वे स्वयं पवनदेव से कह रहे हैं की हे देव आप तो हनुमान को रोकिये, अन्यथा अनर्थ हो जायेगा. जिस दुष्ट का वद्ध श्री त्रिभुवन के नाथ अयोध्यापति श्री राम के हाथों होना लिखा है कहीं वः काम हनुमान ना कर बैठे.
कोटि कोटि शंखों की प्रतिध्वनी हनुमान जी कानों में गुंजायमान हुई, और दिखने लगी मुस्कुराते हुए भगवान राम की प्रतिछाया युद्ध समर के बीचों बीच. जैसे स्वयं श्री हरी विष्णु, त्रिदेव, देवियों, यक्ष, गणों, भूतों, ऋषियों समस्त उनसे प्रार्थना कर रहे हैं की हे वीरवर महाबली महा पराक्रमी महा रूद्र अवतार श्री हनुमान जी, आप यह पाप अपनें हाथों ना करें. रहम रहम रहम कपिश रहम ......

हनुमान जी नें सोचा जब स्वयं राम ही आदेश दे रहे हैं तो मैं कौन होता हूँ इस पिशाच के प्राण हरने वाला, पर इस पापी, इस दुष्ट, इस घमंडी को जरा मजा तो चखा ही दूँ. और उन्होंने जय श्री राम का उद्घोष करते हुए एक भयंकर प्रलयकारी मुष्टिका का प्रहार रावण पर कर ही दिया.

इतने में ही रावण के जड, चेतन एक हो गए, 20सों ऑंखें बाहर निकल आई, 10सों सिर अलग अलग दिशाओं में गोते खाने लगे, जंघाएँ थर्रा गई, गला सूख गया और बेसुध होता रावण हनुमान के विराट स्वरूप के दर्शनों से अभुभुत होता हुआ बेसुध हो गया. राक्षस गण उसे लेकर सुमंत वैद के पास लंका की और दौड़ पड़े.....

तुलसीदास जी नें इस छंद में बड़ा सुंदर वर्णन किया है:
मुरुछा गे बहोरि सो जागा , कपि बल बिपुल सराहन लागा
धिग धिग मम पौरुष धिग मोही , जों तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही ||

“आज रावण की स्थिति फिर वही है” लक्ष्मण जी के हाथों बुरी तरह परास्त हुआ रावण, यूँ कहिये की दोनों के द्वारा ही मौन स्वीक्रति से माफ़ किया गया रावण, मौत के मुंह से बचा रावण, यग्य विध्वंश के बाद हवा के वैग से 10 घोड़ों के रथों पर सवार होकर सम्पूर्ण राक्षस मुद्रा में असंख्य सेना के साथ सम्पूर्ण ताकत से युद्ध क्षेत्र की और बढ़ता ही चला जा रहा हैं:

“जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास
चलेऊ निशाचर कुरुद्ध होई त्यागी जीवन आस |

आज रावण को खोने के लिए कुछ नहीं, आज रावण जीवन में पहली बार इतना व्यथित हुआ की मन्दोदरी कक्ष से निकलते वक्त वह तिलक सामग्री को भी ठोकर मार कर निकला, उसने देखा की मंदोदरी – आदि रानियाँ आज उदास नहीं खुश थी, वे सज धज कर रावण का सत्कार करने आई थी.

चलत होंहिं अति असुभ भयंकर , बेठहिं गीद्ध उड़ाइ सिरन्ह पर
भयउ कालबस काहू न माना , कहेसि बजावहु जुद्द निशाना

रावण चलते हुए ही सश्त्रों से सुसज्जीत हो रहा है, साथ ही ज्योतिषविधान से देखता जा रहा है उन सभी मंगल अमंगल गतियों को जो उसके माथे से होकर गुजर रही है, मकर रेखा तिरछी है, गिद्ध उड़ उड़ कर उसके दशों सिर पर मंडराए जा रहे हैं, लाल रंग की पोशाकों में बंधी ब्राह्मण स्त्रियाँ झरोखों से देख रही हैं, आज रावण काल के वश में है परन्तु क्रोध आज उसका सगा नहीं, महल से निकला तो शनी देव जाते हुए दिखे जो बरसों से उसके सिंघासन के निचे उलटे बंधे थे.

महल के बाहर निकला तो कहा – झाल बांधों, जलकोटी से आगे निकला तो कहा नाले खोल दो, अशोक वाटिका के सामने से निकला तो कहा द्वार घेर लो, लंका द्व्ज के नीचे से गुजरा तो पिशाचों की अपार सेना के सेनापतियों को आदेश दिया सशत्र चढाओं, और लंका द्वार की प्रथम बुर्ज से आगे खुला मैदान थे – दशों मुखों ने एक स्वर में आदेश भांजा – युद्ध का डंका बजाओ .....

चली तमीचर अणि अपारा , बहु गज रथ पदाति असवारा
प्रभु सन्मुख धाए खल कैसे , सलभ समूह अनल कहँ जैसे ||

#क्रमश :

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