उस और पुराणी दिल्ली है - Poem - शक्ति बारैठ


उस और पुराणी दिल्ली है
इस औऱ उतरता जमुना जल

उस और बाग लहराते है
इस और वही सड़ता सा कल,
किस मस्जिद की किस मूर्त से
नाम तुम्हारा पुछे हम,
सुना है दिल्ली के आंगन से
हर रात कबू उड़ जाते है ।
इस और उतरता जमुना जल
उस और बाग़ लहराते है ।।

चोके झुमके चन्दन पानी
ऊँची जहाँ मीनारे है

सागर तल से नीची दिल्ली
डूबे मझधार किनारे है,
काका जी की कोठी थी
तब हम भी दिल्ली वासी थे
नबी मोहल्ले की पीछे घर
ग़ालिब चोक निवासी थे,
काका जी के बाद हमारा
छूटा दिल्ली जैसे तुम
आना चाहे तो क्यों आयें
सोच सोच डर जाते है ।
इस और उतरता जमुना जल
उस और बाग़ लहराते है ।।
सुना है दिल्ली के आंगन से
हर रात कबू उड़ जाते है ।।।


बिरहा रातें काली बारिश
कुछ तो याद तुम्हें होगा

सीसे के दर्पण टूटे 
पर किस्सा याद तुम्हे होगा
एक सड़क झेलम वाली
और एक सड़क गंगा वाली
और ये जमुना के तीर अभी तक
तेरी दिल्ली याद दिलाते है,
इस और उतरता जमुना जल
उस और बाग़ लहराते है ।।
सुना है दिल्ली के आंगन से
हर रात कबू उड़ जाते है ।।।


इस साँझ से पूछुंगा में भी
वो साँझ कहाँ तक जाती है

क्या वो हिरणमगरी आँखें
अभी भी गीत सुनाती है
उड़ते दुप्पटे की खुश्बू
क्या अब भी कहीं लहराती है
निजां साब की छत के ऊपर
तारे रात लुटाती है
बस दरियागंज से लगने वाली
क्या कश्मीरी गेट को जाती है
लाल किले की बड़ी मीनारे
तेरी महकी सबां लुटाती है
किस्से किस्से चप्पे चप्पे
दिल के राज छुपाते है
इस और उतरता जमुना जल
उस और बाग़ लहराते है ।।
सुना है दिल्ली के आंगन से
हर रात कबू उड़ जाते है ।।।


#बारैठ |  Poem By Shakti Bareth
Us Aur Purani Dilli Hai

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