एक कविता - रात यों कहने लगा मुझ से गगन का चाँद - रामधारी सिंह दिनकर - संकलन शक्ति बारैठ



1959 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ द्वारा सम्मानित रामधारी सिंह 'दिनकर' जी की रचना यात्रा ‘रामनरेश त्रिपाठी’ की ‘पथिक’ से प्रभावित होकर ‘मेघनाथ-वध’ नामक रचना से शुरू तो हुई किन्तु इसे वे पूरा न कर पाए अधूरा ही छोड़ दिया। 1928 में ‘प्रण भंग’ उनकी पहली प्रकाशित रचना मानी जाती है जो अब अप्राप्य है।

रामधारी सिंह 'दिनकर' की यह कविता मेरी पसंदीदा कविताओं में से एक है : एक दिन कहनें लगा मुझसे गगन का चाँद कविता में मुख्यत: तीन पात्र है - एक स्वयं कवि , एक चन्द्रमा और एक चांदनी | यह इन तीनों के माध्यम से दर्शाई गई कविता है: आनंद लीजिये :

इसी कविता को तर्पण नामक कार्यक्रम में 21 वीं सदी के श्रेष्ट कवि श्री कुमार विश्वास नें भी स्वरबद्ध किया है जिसे आप यु ट्यूब पर भी सुन सकते हैं.

रात यों कहने लगा मुझ से गगन का चाँद 
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बना कर आप ही फंसता 
और फिर बेचैन हो जगता न सोता है। 


जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जन्मते-मरते 
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी 
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। 

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबला जल का;
आज उठता और कल फिर फूट जाता है;
किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता कविता बनाता है । 

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली 
देख फिर से, चाँद! मुझ को जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, 
आग को उस में गला लोहा बनाती हूँ,
और उस पर नींव रखती हूँ नए घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ 

मनु नहीं, मनु पुत्र है यह सामने जिसकी 
कल्पना की जीभ में भी धार होती है 
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल 
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है। 

स्वर्ग के सम्राट को जा कर ख़बर कर दे,
"रोज़ ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे भी हो इन स्वप्न वालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे। " 

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