जिनकी एक कविता आज मैं यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ , उन्होंने महाप्राण निराला जी के एक प्रसिद्ध काव्य ग्रन्थ या कव्यावली पर टिप्पणी करते हुए कहा था की जो भाषा और जो शब्द चयन निराला नें "राम की शक्ति पूजा" में किये हैं वह सांप बिच्छु झाड़ने जैसी है : "एक समर्ध कवि नें ऐसा क्यों कहा होगा वःह भी उस सदी के दुसरे सर्वमान्य कवी के बारे मैं" ? राम जी ही जाने :
खैर तब के कवि कुछ और थे एवं अब के कवि कुछ और:
- रामनरेश त्रिपाठी जी नें अपनें जीवन काल में 50 से भी ज्यादा भाषाओँ को उपयोग करते हुए 100 से अधिक पुस्तकें लिखी :
रामनरेश त्रिपाठी जी से मेरा जुडाव कविताओं से नहीं रंगकर्म से हुआ, जब उनका लिखा एक नाटक मैं पढ़ रहा था - 'बा और बापू' उनके द्वारा लिखा गया हिंदी का पहला एकांकी नाटक है।
कुछ दिन पहले उनकी एक कविता पढनें को मिली, अच्छा महसूस हुआ, आप भी पढिये: शायद पसंद आये :
मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में।
तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में॥
तू 'आह' बन किसी की, मुझको पुकारता था।
मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में॥
मेरे लिए खड़ा था, दुखियों के द्वार पर तू।
मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में॥
बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू।
आँखे लगी थी मेरी, तब मान और धन में॥
बाजे बजाबजा कर, मैं था तुझे रिझाता।
तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में॥
मैं था विरक्त तुझसे, जग की अनित्यता पर।
उत्थान भर रहा था, तब तू किसी पतन में॥
बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था।
मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में॥
तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं।
तू कर्म में मगन था, मैं व्यस्त था कथन में॥
तेरा पता सिकंदर को, मैं समझ रहा था।
पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में॥
क्रीसस की 'हाय' में था, करता विनोद तू ही।
तू अंत में हंसा था, महमुद के रुदन में॥
प्रहलाद जानता था, तेरा सही ठिकाना।
तू ही मचल रहा था, मंसूर की रटन में॥
आखिर चमक पड़ा तू गाँधी की हड्डियों में।
मैं था तुझे समझता, सुहराब पीले तन में।
कैसे तुझे मिलूँगा, जब भेद इस कदर है।
हैरान होके भगवन, आया हूँ मैं सरन में॥
तू रूप कै किरन में सौंदर्य है सुमन में।
तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में॥
कठिनाइयों दुखों का, इतिहास ही सुयश है।
मुझको समर्थ कर तू, बस कष्ट के सहन में॥
दुख में न हार मानूँ, सुख में तुझे न भूलूँ।
ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥
- #बारैठ
फोटो - पिलानी - स्टूडेंट कैंटीन :

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