Jankavi Ramashankar Yadav - Indian Poet
Ramashankar Yadav, also known as Vidrohi, was an Indian poet and social activist who went to Jawaharlal Nehru University as a student but continued to live on or around its campus well beyond his student life.
विद्रोही अभी ज़िंदा हैं. सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लेंगे, सारे तानाशाह और ज़ुल्मी मर जाएंगे, उसके बाद विद्रोही मरेंगे आराम से, वसंत ऋतु में.
"अक्टूबर, 2015 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नॉन नेट फेलोशिप खत्म करने का निर्णय लिया तो जेएनयू के छात्र यूजीसी के सामने धरने पर बैठ गए. यह प्रदर्शन बहुत लंबा चला. अक्यूपाई यूजीसी नाम से चल रहा यह आंदोलन फेलोशिप खत्म करने, शिक्षा का निजीकरण करने और मौजूदा सरकार की नीतियों के खिलाफ था."
इसी आंदोलन में एक कवि शरीक था, जिसकी दुनिया बस जेएनयू की चहारदीवारी और जेएनयू के छात्र थे. कविता और वास्तविक जीवन दोनों में समान रूप से ‘विद्रोही’ यह कवि अपनी कविताओं के साथ छात्रों के साथ खड़ा था. लेकिन ‘बड़े-बड़े लोग पहले मर लें/फिर मैं मरूं- आराम से/उधर चल कर वसंत ऋतु में’ जैसी पंक्तियां लिखने वाला यह कवि वसंत आने से पहले प्रदर्शनस्थल पर ही आठ दिसंबर, 2015 को अचानक जहान-ए-फानी को अलविदा कह गया.
यह कवि थे रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’. विद्रोही सिर्फ एक कवि नहीं थे, जेएनयू के छात्रों के लिए विद्रोही व्यवस्था के खिलाफ उठती जनपक्षधर आवाज़ों के प्रतीक थे. विद्रोही अपनी कविताओं में जैसा विद्रोह रचते थे, उन्होंने उसी तरह विद्रोह करते हुए अंतिम सांस ली.
सच कहें तो ना कभी कवि कहीं ठहरे हैं ना कवितायेँ ! यह एक सुदूर जाने वाले प्रेम की यात्रा है जो अनवरत एवं अविरल बहती रही है, बहती रहेगी ! सर्वदा सर्वदा :)
आज की कड़ी में कविता है जनकवि रमाशंकर यादव विद्रोही की, और कविता को जीवंत किया है, जाने माने वरिष्ठ रंगकर्मी , थिएटर डायरेक्टर और यूनिवर्सल थिएटर अकादमी के डायरेक्टर केशव गुप्ता जी नें.
कैमरा के दूसरी तरफ है शक्ति बारैठ.
अगली कड़ी में फिर मिलते हैं, एक और नई हिंदी उर्दू कविता, ग़जल, इंटरव्यू के साथ | तब तक पढिये, सुनिए और शेयर करते रहिये. यही एक पूंजी है जो आपसे मांगी जायेगी :)
Created by : shakti bareth
Camera/Editing : टीम शक्ति बारैठ स्टूडियो, निकेतन शर्मा और निशा पोरवाल
#RamashankarYadav #Kavi #JNU
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